गंगा दशहरा: भारत की आध्यात्मिक परंपरा में माँ गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि मोक्षदायिनी, पापहारिणी और जीवनदायिनी शक्ति मानी गई हैं। सनातन धर्म में वर्षभर अनेक पर्व आते हैं, लेकिन गंगा दशहरा का पर्व विशेष रूप से पुण्य, शुद्धि और आत्मकल्याण का पर्व माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इसी दिन माँ गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं।
इस दिन गंगा स्नान, दान, जप और पूजा करने से दस प्रकार के पापों का नाश होता है, इसलिए इसे “गंगा दशहरा” कहा जाता है। गंगा दशहरा 25 मई 2026, सोमवार को मनाया जाएगा। गंगा दशहरा माँ गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की स्मृति में मनाया जाता है।
पुराणों के अनुसार राजा सगर के 60 हजार पुत्र कपिल मुनि के श्राप से भस्म हो गए थे। उनकी आत्माओं की मुक्ति के लिए राजा भगीरथ ने कठोर तपस्या की। भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर माँ गंगा पृथ्वी पर आने के लिए तैयार हुईं। लेकिन गंगा का वेग इतना प्रचंड था कि पृथ्वी उसे सहन नहीं कर सकती थी। तब भगवान शिव ने अपनी जटाओं में गंगा को धारण किया और धीरे-धीरे पृथ्वी पर प्रवाहित किया। स्कन्द पुराण में कहा गया है—
“गंगा स्नानं दशहरायां
महापातक नाशनम्।”
अर्थात गंगा दशहरा के दिन गंगा स्नान करने से महापाप नष्ट हो जाते हैं।
“दशहरा” का अर्थ है— दस प्रकार के पापों का हरण। ये दस पाप माने गए हैं—तीन शरीर से, चार वाणी से, तीन मन से। गंगा दशहरा के दिन स्नान, जप और पूजा से इन पापों का क्षय होता है।

ज्योतिष में जल तत्व का संबंध चंद्रमा, मन और भावनाओं से माना गया है।
माँ गंगा का संबंध—चंद्रमा, गुरु और आध्यात्मिक ऊर्जा से माना जाता है।
- यदि कुंडली में चंद्रमा कमजोर हो—मानसिक तनाव, भय,अनिद्रा,
चिंता तो गंगा स्नान और चंद्र मंत्र जप लाभ देता है। - गंगा तर्पण और दान से पितृ प्रसन्न होते हैं।
- बहते जल में तिल प्रवाहित करने से राहु-केतु के दुष्प्रभाव कम माने जाते हैं।
- गंगा पूजा और दान से गुरु ग्रह मजबूत होता है।
यदि संभव हो तो गंगा नदी में स्नान करें।
यदि गंगा तट पर न हों, तो घर के जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करें। स्नान के बाद सूर्यदेव को जल अर्पित करें। माँ गंगा की तस्वीर या कलश स्थापित करें।
गंगा मंत्र “ॐ श्री गंगे नमः।” 108 बार जप करें।
शास्त्रों में जलदान और अन्नदान का विशेष महत्व है।
दान करें— जल से भरा घड़ा, वस्त्र, छाता, पंखा, सत्तू,फल,गौसेवा।
वाराणसी में गंगा दशहरा का विशेष महत्व है।
दशाश्वमेध घाट, अस्सी घाट और पंचगंगा घाट पर विशेष पूजा और गंगा आरती होती है। गंगा केवल नदी नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं। गंगा दशहरा हमें बाहरी और आंतरिक शुद्धि का संदेश देता है। यदि हम इस दिन केवल स्नान ही नहीं, बल्कि अपने विचारों को भी निर्मल बना लें, तो यही सच्ची गंगा पूजा होगी। आइए अंत में माँ गंगा से प्रार्थना करें—
“देवि सुरेश्वरि भगवति गंगे
त्रिभुवन तारिणि तरल तरंगे।”
हर हर गंगे!
हर हर महादेव!

